श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 61: विश्वामित्र की पुष्कर तीर्थ में तपस्या तथा राजर्षि अम्बरीष का ऋचीक के मध्यम पुत्र शुनःशेप को यज्ञ-पशु बनाने के लिये खरीदकर लाना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  1.61.2 
महाविघ्न: प्रवृत्तोऽयं दक्षिणामास्थितो दिशम्।
दिशमन्यां प्रपत्स्यामस्तत्र तप्स्यामहे तप:॥ २॥
 
 
अनुवाद
‘महर्षिओ! इस दक्षिण दिशा में रहने से हमारी तपस्या में बड़ी बाधा हुई है; अतः अब हम दूसरी दिशा में जाकर वहीं रहकर तपस्या करेंगे॥ 2॥
 
‘Maharishis! Staying in this southern direction has caused a great hindrance to our penance; hence we will now go to the other direction and stay there and do penance.॥ 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)