vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Apps
About
Contact
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
»
काण्ड 1: बाल काण्ड
»
सर्ग 61: विश्वामित्र की पुष्कर तीर्थ में तपस्या तथा राजर्षि अम्बरीष का ऋचीक के मध्यम पुत्र शुनःशेप को यज्ञ-पशु बनाने के लिये खरीदकर लाना
»
श्लोक 15-16h
श्लोक
1.61.15-16h
एवमुक्तो महातेजा ऋचीकस्त्वब्रवीद् वच:॥ १५॥
नाहं ज्येष्ठं नरश्रेष्ठ विक्रीणीयां कथंचन।
अनुवाद
उसके ऐसा कहने पर परम बलशाली ऋचीक ने कहा - 'हे नरश्रेष्ठ! मैं किसी भी अवस्था में अपने ज्येष्ठ पुत्र को नहीं बेचूँगा।'
On his saying this, the very powerful Richik said - 'O best of men! I will not sell my eldest son under any circumstances.' 15 1/2
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
About Us
|
Contact Us
|
Privacy Policy
|
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×