श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 61: विश्वामित्र की पुष्कर तीर्थ में तपस्या तथा राजर्षि अम्बरीष का ऋचीक के मध्यम पुत्र शुनःशेप को यज्ञ-पशु बनाने के लिये खरीदकर लाना  »  श्लोक 15-16h
 
 
श्लोक  1.61.15-16h 
एवमुक्तो महातेजा ऋचीकस्त्वब्रवीद् वच:॥ १५॥
नाहं ज्येष्ठं नरश्रेष्ठ विक्रीणीयां कथंचन।
 
 
अनुवाद
उसके ऐसा कहने पर परम बलशाली ऋचीक ने कहा - 'हे नरश्रेष्ठ! मैं किसी भी अवस्था में अपने ज्येष्ठ पुत्र को नहीं बेचूँगा।'
 
On his saying this, the very powerful Richik said - 'O best of men! I will not sell my eldest son under any circumstances.' 15 1/2
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)