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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
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काण्ड 1: बाल काण्ड
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सर्ग 61: विश्वामित्र की पुष्कर तीर्थ में तपस्या तथा राजर्षि अम्बरीष का ऋचीक के मध्यम पुत्र शुनःशेप को यज्ञ-पशु बनाने के लिये खरीदकर लाना
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श्लोक 12
श्लोक
1.61.12
तमुवाच महातेजा: प्रणम्याभिप्रसाद्य च।
महर्षिं तपसा दीप्तं राजर्षिरमितप्रभ:॥ १२॥
अनुवाद
तेजस्वी एवं तेजस्वी राजर्षि अम्बरीष ने तपस्या से प्रफुल्लित महर्षि ऋचीक को प्रणाम किया और प्रसन्न होकर कहा ॥12॥
The bright and brilliant Rajarshi Ambarish bowed to Maharishi Richik, who was energized by penance, and pleased him and said. 12॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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