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ramayan 1.60.28-29: राजा त्रिशंकु सदैव स्वर्ग का आनंद लें। मेरे द्वारा बनाए गए सभी तारे सदैव विद्यमान रहें। जब तक यह संसार रहेगा, तब तक मेरी बनाई हुई ये सभी वस्तुएँ सदैव विद्यमान रहें। हे देवताओं! आप सभी इन वस्तुओं को स्वीकार करें।   |   ramayan सर्ग 1.60: ऋषियों द्वारा यज्ञ का आरम्भ, त्रिशंकु का सशरीर स्वर्गगमन, इन्द्र द्वारा स्वर्ग से उनके गिराये जाने पर क्षुब्ध हुए विश्वामित्र का नूतन देवसर्ग के लिये उद्योग   ।   ramayan काण्ड 1: बाल काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 60: ऋषियों द्वारा यज्ञ का आरम्भ, त्रिशंकु का सशरीर स्वर्गगमन, इन्द्र द्वारा स्वर्ग से उनके गिराये जाने पर क्षुब्ध हुए विश्वामित्र का नूतन देवसर्ग के लिये उद्योग  »  श्लोक 28-29
 
 
श्लोक  1.60.28-29 
स्वर्गोऽस्तु सशरीरस्य त्रिशङ्कोरस्य शाश्वत:।
नक्षत्राणि च सर्वाणि मामकानि ध्रुवाण्यथ॥ २८॥
यावल्लोका धरिष्यन्ति तिष्ठन्त्वेतानि सर्वश:।
यत् कृतानि सुरा: सर्वे तदनुज्ञातुमर्हथ॥ २९॥
 
 
अनुवाद
राजा त्रिशंकु सदैव स्वर्ग का आनंद लें। मेरे द्वारा बनाए गए सभी तारे सदैव विद्यमान रहें। जब तक यह संसार रहेगा, तब तक मेरी बनाई हुई ये सभी वस्तुएँ सदैव विद्यमान रहें। हे देवताओं! आप सभी इन वस्तुओं को स्वीकार करें।
 
‘May King Trisanku always enjoy the bliss of heaven. May all the stars I have created always exist. As long as the world exists, may all these things that I have created always exist. O Gods! All of you please approve of these things.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)