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श्लोक 1.59.13-15h  |
क्षत्रियो याजको यस्य चण्डालस्य विशेषत:॥ १३॥
कथं सदसि भोक्तारो हविस्तस्य सुरर्षय:।
ब्राह्मणा वा महात्मानो भुक्त्वा चाण्डालभोजनम्॥ १४॥
कथं स्वर्गं गमिष्यन्ति विश्वामित्रेण पालिता:। |
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| अनुवाद |
| वे कहते हैं कि जो चाण्डाल है और जिसका आचार्य क्षत्रिय है, उसके यज्ञ का हविष्य कोई ऋषि या श्रेष्ठ ब्राह्मण कैसे खा सकता है? अथवा विश्वामित्र द्वारा पाला गया ब्राह्मण चाण्डाल का अन्न खाकर स्वर्ग कैसे जा सकता है?॥13-14 1/2॥ |
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| ‘They say, how can a sage or a great Brahmin eat the offerings in the yagya of one who is a Chandala and whose acharya is a Kshatriya? Or how can a Brahmin brought up by Vishwamitra go to heaven after eating the food of a Chandala?’॥13-14 1/2॥ |
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