श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 57: विश्वामित्र की तपस्या, राजा त्रिशंकु का यज्ञ के लिये वसिष्ठजी से प्रार्थना करना,उनके इन्कार करने पर उन्हीं के पुत्रों की शरण में जाना  »  श्लोक 9-10h
 
 
श्लोक  1.57.9-10h 
एवं निश्चित्य मनसा भूय एव महातपा:॥ ९॥
तपश्चचार धर्मात्मा काकुत्स्थ परमात्मवान्।
 
 
अनुवाद
श्रीराम! ऐसा मन में विचार करके मन को वश में करने वाले महान तपस्वी एवं धर्मात्मा विश्वामित्र पुनः घोर तप में लग गए। 9 1/2॥
 
Sriram! Thinking this in his mind, Vishwamitra, the great ascetic and religious soul who controlled his mind, again engaged in heavy penance. 9 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)