श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 57: विश्वामित्र की तपस्या, राजा त्रिशंकु का यज्ञ के लिये वसिष्ठजी से प्रार्थना करना,उनके इन्कार करने पर उन्हीं के पुत्रों की शरण में जाना  »  श्लोक 4-6h
 
 
श्लोक  1.57.4-6h 
पूर्णे वर्षसहस्रे तु ब्रह्मा लोकपितामह:॥ ४॥
अब्रवीन्मधुरं वाक्यं विश्वामित्रं तपोधनम्।
जिता राजर्षिलोकास्ते तपसा कुशिकात्मज॥ ५॥
अनेन तपसा त्वां हि राजर्षिरिति विद्महे।
 
 
अनुवाद
एक हजार वर्ष पूर्ण होने पर ब्रह्माजी ने विश्वामित्र को दर्शन देकर मधुर वाणी में कहा - 'कुशिकानंदन! तुमने तपस्या द्वारा राजर्षियों के लोकों पर विजय प्राप्त कर ली है। इसी तपस्या के प्रभाव से हम तुम्हें सच्चा राजर्षि मानते हैं।' 4-5 1/2॥
 
After completion of one thousand years, Lord Brahma appeared to Vishwamitra and said in a sweet voice - 'Kushikanandan! Through penance you have conquered the worlds of royal sages. Due to the effect of this penance, we consider you a true Rajarshi. 4-5 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)