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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
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काण्ड 1: बाल काण्ड
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सर्ग 57: विश्वामित्र की तपस्या, राजा त्रिशंकु का यज्ञ के लिये वसिष्ठजी से प्रार्थना करना,उनके इन्कार करने पर उन्हीं के पुत्रों की शरण में जाना
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श्लोक 21
श्लोक
1.57.21
प्रत्याख्यातो वसिष्ठेन गतिमन्यां तपोधना:।
गुरुपुत्रानृते सर्वान् नाहं पश्यामि कांचन॥ २१॥
अनुवाद
'तपोधनो! महात्मा वशिष्ठ के अस्वीकार करने पर अब मैं अपने लिए समस्त गुरुपुत्रों की शरण लेने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं देखता। 21॥
'Tapodhono! After Mahatma Vashishtha's rejection, now I do not see any other option for myself except to seek refuge in all the Guru's sons. 21॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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