श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 57: विश्वामित्र की तपस्या, राजा त्रिशंकु का यज्ञ के लिये वसिष्ठजी से प्रार्थना करना,उनके इन्कार करने पर उन्हीं के पुत्रों की शरण में जाना  »  श्लोक 11-12h
 
 
श्लोक  1.57.11-12h 
तस्य बुद्धि: समुत्पन्ना यजेयमिति राघव॥ ११॥
गच्छेयं स्वशरीरेण देवतानां परां गतिम्।
 
 
अनुवाद
हे रघुनन्दन! उनके मन में विचार आया कि 'मुझे ऐसा यज्ञ करना चाहिए जिससे मैं इस शरीर सहित देवताओं के परम धाम - स्वर्ग को प्राप्त कर सकूँ।'
 
O Raghunandan! The thought came to his mind that 'I should perform such a yajna that I can reach the ultimate destination of the gods - heaven along with this body.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)