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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
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काण्ड 1: बाल काण्ड
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सर्ग 57: विश्वामित्र की तपस्या, राजा त्रिशंकु का यज्ञ के लिये वसिष्ठजी से प्रार्थना करना,उनके इन्कार करने पर उन्हीं के पुत्रों की शरण में जाना
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श्लोक 10-11h
श्लोक
1.57.10-11h
एतस्मिन्नेव काले तु सत्यवादी जितेन्द्रिय:॥ १०॥
त्रिशङ्कुरिति विख्यात इक्ष्वाकुकुलवर्धन:।
अनुवाद
इस समय इक्ष्वाकुकुल की कीर्ति बढ़ाने वाले एक सत्यवादी और जितेन्द्रिय राजा राज्य करते थे, जिनका नाम त्रिशंकु था ॥10 1/2॥
At this time, a truthful and Jitendriya king who increased the fame of Ikshvakukul ruled. His name was Trishanku. 10 1/2॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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