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ramayan 1.55.27: "ओह! तुमने इस आश्रम को नष्ट कर दिया है, जिसे मैंने बहुत समय तक पाला-पोसा था। इसलिए तुम दुष्ट और बुद्धिहीन हो। और इस पाप के कारण तुम शांति से नहीं रह सकते।" ॥27॥   |   ramayan सर्ग 1.55: अपने सौ पुत्रों और सारी सेना के नष्ट हो जाने पर विश्वामित्र का तपस्या करके दिव्यास्त्र पाना, वसिष्ठजी का ब्रह्मदण्ड लेकर उनके सामने खड़ा होना   ।   ramayan काण्ड 1: बाल काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 55: अपने सौ पुत्रों और सारी सेना के नष्ट हो जाने पर विश्वामित्र का तपस्या करके दिव्यास्त्र पाना, वसिष्ठजी का ब्रह्मदण्ड लेकर उनके सामने खड़ा होना  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  1.55.27 
आश्रमं चिरसंवृद्धं यद् विनाशितवानसि।
दुराचारो हि यन्मूढस्तस्मात् त्वं न भविष्यसि॥ २७॥
 
 
अनुवाद
"ओह! तुमने इस आश्रम को नष्ट कर दिया है, जिसे मैंने बहुत समय तक पाला-पोसा था। इसलिए तुम दुष्ट और बुद्धिहीन हो। और इस पाप के कारण तुम शांति से नहीं रह सकते।" ॥27॥
 
"Oh! You have destroyed and ruined this hermitage which I had nurtured and nourished for a long time. Therefore you are wicked and devoid of wisdom. And because of this sin you cannot live peacefully." ॥27॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)