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ramayan 1.55.20: जैसे पूर्णिमा पर समुद्र उमड़ने लगता है, वैसे ही वह अपने पराक्रम में स्वयं को बहुत श्रेष्ठ समझने लगा। हे श्रीराम! उसने सोचा कि महर्षि वसिष्ठ उस समय मर चुके हैं।   |   ramayan सर्ग 1.55: अपने सौ पुत्रों और सारी सेना के नष्ट हो जाने पर विश्वामित्र का तपस्या करके दिव्यास्त्र पाना, वसिष्ठजी का ब्रह्मदण्ड लेकर उनके सामने खड़ा होना   ।   ramayan काण्ड 1: बाल काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 55: अपने सौ पुत्रों और सारी सेना के नष्ट हो जाने पर विश्वामित्र का तपस्या करके दिव्यास्त्र पाना, वसिष्ठजी का ब्रह्मदण्ड लेकर उनके सामने खड़ा होना  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  1.55.20 
विवर्धमानो वीर्येण समुद्र इव पर्वणि।
हतं मेने तदा राम वसिष्ठमृषिसत्तमम्॥ २०॥
 
 
अनुवाद
जैसे पूर्णिमा पर समुद्र उमड़ने लगता है, वैसे ही वह अपने पराक्रम में स्वयं को बहुत श्रेष्ठ समझने लगा। हे श्रीराम! उसने सोचा कि महर्षि वसिष्ठ उस समय मर चुके हैं।
 
‘Just as the sea begins to rise on the full moon, similarly he began to consider himself to be very superior in his prowess. Shri Ram! He thought that the great sage Vasishtha was dead at that time.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)