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ramayan 1.55.18-19: 'तब 'एवमस्तु' कहकर देवेश्वर भगवान शंकर वहाँ से चले गए। देवेश्वर महादेव से वह अस्त्र पाकर महाबली विश्वामित्र अत्यंत अभिमानी हो गए। वे अहंकार से भर गए। 18-19॥   |   ramayan सर्ग 1.55: अपने सौ पुत्रों और सारी सेना के नष्ट हो जाने पर विश्वामित्र का तपस्या करके दिव्यास्त्र पाना, वसिष्ठजी का ब्रह्मदण्ड लेकर उनके सामने खड़ा होना   ।   ramayan काण्ड 1: बाल काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 55: अपने सौ पुत्रों और सारी सेना के नष्ट हो जाने पर विश्वामित्र का तपस्या करके दिव्यास्त्र पाना, वसिष्ठजी का ब्रह्मदण्ड लेकर उनके सामने खड़ा होना  »  श्लोक 18-19
 
 
श्लोक  1.55.18-19 
एवमस्त्विति देवेशो वाक्यमुक्त्वा गतस्तदा॥ १८॥
प्राप्य चास्त्राणि देवेशाद् विश्वामित्रो महाबल:।
दर्पेण महता युक्तो दर्पपूर्णोऽभवत् तदा॥ १९॥
 
 
अनुवाद
'तब 'एवमस्तु' कहकर देवेश्वर भगवान शंकर वहाँ से चले गए। देवेश्वर महादेव से वह अस्त्र पाकर महाबली विश्वामित्र अत्यंत अभिमानी हो गए। वे अहंकार से भर गए। 18-19॥
 
'Then saying 'Evamastu' Deveshwar Lord Shankar left from there. The mighty Vishwamitra became very proud after receiving that weapon from Deveshwar Mahadev. They were filled with pride. 18-19॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)