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ramayan 1.55.17-18h: "अनघ! देवता, दानव, ऋषि, गन्धर्व, यक्ष और राक्षसों के पास जो भी अस्त्र-शस्त्र हैं, वे आपकी कृपा से मेरे हृदय में चमक उठें। हे देवराज! यही मेरी इच्छा है, जिसे मैं प्राप्त करूँ।" ॥17 1/2॥   |   ramayan सर्ग 1.55: अपने सौ पुत्रों और सारी सेना के नष्ट हो जाने पर विश्वामित्र का तपस्या करके दिव्यास्त्र पाना, वसिष्ठजी का ब्रह्मदण्ड लेकर उनके सामने खड़ा होना   ।   ramayan काण्ड 1: बाल काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 55: अपने सौ पुत्रों और सारी सेना के नष्ट हो जाने पर विश्वामित्र का तपस्या करके दिव्यास्त्र पाना, वसिष्ठजी का ब्रह्मदण्ड लेकर उनके सामने खड़ा होना  »  श्लोक 17-18h
 
 
श्लोक  1.55.17-18h 
यानि देवेषु चास्त्राणि दानवेषु महर्षिषु।
गन्धर्वयक्षरक्ष:सु प्रतिभान्तु ममानघ॥ १७॥
तव प्रसादाद् भवतु देवदेव ममेप्सितम्।
 
 
अनुवाद
"अनघ! देवता, दानव, ऋषि, गन्धर्व, यक्ष और राक्षसों के पास जो भी अस्त्र-शस्त्र हैं, वे आपकी कृपा से मेरे हृदय में चमक उठें। हे देवराज! यही मेरी इच्छा है, जिसे मैं प्राप्त करूँ।" ॥17 1/2॥
 
"Anagh! May all the weapons possessed by the gods, demons, sages, Gandharvas, Yakshas and demons sparkle in my heart by your grace. O Lord of gods! This is my desire, which I should achieve." ॥17 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)