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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 49: इन्द्र को भेड़े के अण्डकोष से युक्त करना,भगवान् श्रीराम के द्वारा अहल्या का उद्धार  »  श्लोक 14-15
 
 
श्लोक  1.49.14-15 
प्रयत्नान्निर्मितां धात्रा दिव्यां मायामयीमिव।
धूमेनाभिपरीतांगीं दीप्तामग्निशिखामिव॥ १४॥
सतुषारावृतां साभ्रां पूर्णचन्द्रप्रभामिव।
मध्येऽम्भसो दुराधर्षां दीप्तां सूर्यप्रभामिव॥ १५॥
 
 
अनुवाद
उसका रूप दिव्य था। विधाता ने बड़ी मेहनत से उसके अंगों की रचना की थी। वह मायावी प्रतीत हो रही थी। वह धुएँ से घिरी हुई प्रज्वलित ज्वाला के समान प्रतीत हो रही थी। वह ओलों और बादलों से आवृत पूर्णिमा की प्रभा के समान तथा जल के भीतर से निकलते हुए सूर्य की प्रचण्ड प्रभा के समान प्रतीत हो रही थी।॥14-15॥
 
Her form was divine. The Creator had created her body parts with great effort. She appeared to be illusory. She appeared like a blazing flame surrounded by smoke. She appeared like the glow of the full moon covered by hail and clouds and appeared like the fierce glow of the sun emerging from under water.॥14-15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)