श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 48: मुनियों सहित श्रीराम का मिथिलापुरी में पहुँचना, विश्वामित्रजी का उनसे अहल्या को शाप प्राप्त होने की कथा सुनाना  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  1.48.27 
मम रूपं समास्थाय कृतवानसि दुर्मते।
अकर्तव्यमिदं यस्माद् विफलस्त्वं भविष्यसि॥ २७॥
 
 
अनुवाद
हे दुष्ट! तूने मेरा रूप धारण करके यह अक्षम्य पाप किया है, अतः तू अण्डकोषों से रहित हो जाएगा॥27॥
 
"You scoundrel! You have committed this unpardonable sin by taking my form, hence you will fail (without testicles)'. 27॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)