श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 48: मुनियों सहित श्रीराम का मिथिलापुरी में पहुँचना, विश्वामित्रजी का उनसे अहल्या को शाप प्राप्त होने की कथा सुनाना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  1.48.15 
गौतमस्य नरश्रेष्ठ पूर्वमासीन्महात्मन:।
आश्रमो दिव्यसंकाश: सुरैरपि सुपूजित:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
हे पुरुषश्रेष्ठ! पूर्वकाल में यह स्थान महात्मा गौतम का आश्रम था। उस समय यह आश्रम अत्यंत दिव्य प्रतीत होता था। देवता भी इसकी पूजा और स्तुति करते थे॥ 15॥
 
‘O best of men! In the past this place was the hermitage of Mahatma Gautam. At that time this hermitage seemed very divine. Even the gods used to worship and praise it.॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)