श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 46: दिति का कश्यपजी से इन्द्र हन्ता पुत्र की प्राप्ति के लिये कुशप्लव में तप, इन्द्र का उनके गर्भ के सात टुकड़े कर डालना  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  1.46.8 
गते तस्मिन् नरश्रेष्ठ दिति: परमहर्षिता।
कुशप्लवं समासाद्य तपस्तेपे सुदारुणम्॥ ८॥
 
 
अनुवाद
हे पुरुषश्रेष्ठ! उनके चले जाने पर दिति बड़े हर्ष और उत्साह से भरी हुई कुशाप्लव नामक तपोवन में आकर अत्यंत कठोर तप करने लगी॥8॥
 
Male best! After his departure, Diti, filled with great joy and enthusiasm, came to the Tapovan named Kushaplava and started performing extremely rigorous penance. 8॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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