श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 46: दिति का कश्यपजी से इन्द्र हन्ता पुत्र की प्राप्ति के लिये कुशप्लव में तप, इन्द्र का उनके गर्भ के सात टुकड़े कर डालना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  1.46.5 
एवं भवतु भद्रं ते शुचिर्भव तपोधने।
जनयिष्यसि पुत्रं त्वं शक्रहन्तारमाहवे॥ ५॥
 
 
अनुवाद
'तपध्ने! ऐसा ही हो। तुम पवित्रता के नियमों का पालन करो। तुम्हारा कल्याण हो। तुम एक ऐसे पुत्र को जन्म दोगी जो युद्ध में इंद्र को मार सकेगा।'
 
‘Tapaadhne! May it be so. You follow the rules of cleanliness. May you be blessed. You will give birth to a son who can kill Indra in battle. 5.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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