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श्लोक 1.46.22-23  |
प्राञ्जलिर्वज्रसहितो दितिं शक्रोऽभ्यभाषत।
अशुचिर्देवि सुप्तासि पादयो: कृतमूर्धजा॥ २२॥
तदन्तरमहं लब्ध्वा शक्रहन्तारमाहवे।
अभिन्दं सप्तधा देवि तन्मे त्वं क्षन्तुमर्हसि॥ २३॥ |
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| अनुवाद |
| तब वज्रधारी इन्द्र ने हाथ जोड़कर दिति से कहा- "देवी! आपके सिर के बाल आपके चरणों का स्पर्श कर गए थे। इस प्रकार आप अपवित्र अवस्था में सोई थीं। इसी छिद्र को पाकर मैंने इस 'इंद्रहत्यारे' बालक के सात टुकड़े कर दिए हैं। अतः हे माता! कृपया मेरे इस अपराध को क्षमा करें।" |
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| Then Indra with the thunderbolt folded his hands and said to Diti- 'Devi! The hair of your head touched your feet. Thus you slept in an impure state. Finding this hole, I have cut this 'Indra killer' boy into seven pieces. Therefore, mother! Please forgive me for this crime of mine.' |
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे षट्चत्वारिंश: सर्ग:॥ ४६॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें छियालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४६॥ |
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