श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 46: दिति का कश्यपजी से इन्द्र हन्ता पुत्र की प्राप्ति के लिये कुशप्लव में तप, इन्द्र का उनके गर्भ के सात टुकड़े कर डालना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  1.46.2 
हतपुत्रास्मि भगवंस्तव पुत्रौर्महाबलै:।
शक्रहन्तारमिच्छामि पुत्रं दीर्घतपोर्जितम्॥ २॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! आपके पराक्रमी देवताओं ने मेरे पुत्रों को मार डाला है; इसलिए मैं दीर्घकाल तक तपस्या करने से प्राप्त ऐसा पुत्र चाहता हूँ जो इन्द्र का वध करने में समर्थ हो॥ 2॥
 
'O Lord! Your mighty sons, the gods, killed my sons; therefore I want a son obtained through long-term penance who would be capable of killing Indra.॥ 2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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