श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 46: दिति का कश्यपजी से इन्द्र हन्ता पुत्र की प्राप्ति के लिये कुशप्लव में तप, इन्द्र का उनके गर्भ के सात टुकड़े कर डालना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  1.46.14 
यमहं त्वत्कृते पुत्र तमाधास्ये जयोत्सुकम्।
त्रैलोक्यविजयं पुत्र सह भोक्ष्यसि विज्वर॥ १४॥
 
 
अनुवाद
‘पुत्र! जिस पुत्र से मैंने तुम्हारे विनाश की प्रार्थना की थी, जब वह तुम्हें जीतने के लिए आतुर होगा, तब मैं उसे शांत कर दूँगा - उसे तुम्हारे प्रति द्वेषरहित और भ्रातृ-स्नेह से युक्त कर दूँगा। तब तुम उसके साथ रहकर निश्चिंत होकर उसके द्वारा तीनों लोकों पर विजय का सुख भोगना॥ 14॥
 
‘Son! When the son whom I had prayed for your destruction will be eager to conquer you, I will pacify him – I will make him devoid of animosity towards you and full of brotherly affection. Then you can stay with him and enjoy the happiness of the conquest of the three worlds by him without any worries.॥ 14॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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