| श्रीमद् वाल्मीकि रामायण » काण्ड 1: बाल काण्ड » सर्ग 46: दिति का कश्यपजी से इन्द्र हन्ता पुत्र की प्राप्ति के लिये कुशप्लव में तप, इन्द्र का उनके गर्भ के सात टुकड़े कर डालना » श्लोक 10 |
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| | | | श्लोक 1.46.10  | अग्निं कुशान् काष्ठमप: फलं मूलं तथैव च।
न्यवेदयत् सहस्राक्षो यच्चान्यदपि कांक्षितम्॥ १०॥ | | | | | | अनुवाद | | सहस्राक्ष इन्द्र अपनी बुआ दिति के लिए अग्नि, कुशा, लकड़ी, जल, फल, मूल और अन्य इच्छित वस्तुएँ लाया करते थे ॥10॥ | | | | Sahasraksha Indra used to bring fire, kusha, wood, water, fruits, roots and other desired things for his aunt Diti. 10॥ | | ✨ ai-generated | | |
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