श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 45: देवताओं और दैत्यों द्वारा क्षीर-समुद्र मन्थन, भगवान् रुद्र द्वारा हालाहल विष का पान, देवासुर-संग्राम में दैत्यों का संहार  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  1.45.34 
षष्टि: कोटॺोऽभवंस्तासामप्सराणां सुवर्चसाम्।
असंख्येयास्तु काकुत्स्थ यास्तासां परिचारिका:॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
'ककुत्स्थ! उन सुन्दर और तेजस्वी अप्सराओं की संख्या साठ करोड़ थी और उनकी स्त्रियों की गिनती नहीं की जा सकती थी। वे सब असंख्य थीं ॥ 34॥
 
'Kakutstha! The number of those beautiful and radiant Apsaras was sixty crores and their attendants cannot be counted. They were all innumerable. ॥ 34॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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