श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 45: देवताओं और दैत्यों द्वारा क्षीर-समुद्र मन्थन, भगवान् रुद्र द्वारा हालाहल विष का पान, देवासुर-संग्राम में दैत्यों का संहार  »  श्लोक 31-32
 
 
श्लोक  1.45.31-32 
अथ वर्षसहस्रेण आयुर्वेदमय: पुमान्॥ ३१॥
उदतिष्ठत् सुधर्मात्मा सदण्ड: सकमण्डलु:।
पूर्वं धन्वन्तरिर्नाम अप्सराश्च सुवर्चस:॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
एक हज़ार वर्ष बीत जाने पर उस क्षीर सागर से आयुर्वेद से पूर्ण एक पुण्यात्मा पुरुष प्रकट हुए, जिनके एक हाथ में दंड और दूसरे हाथ में जल का कलश था। उनका नाम धन्वंतरि था। उनके प्रकट होने के बाद सागर से अनेक सुंदर अप्सराएँ प्रकट हुईं।
 
‘After a thousand years had passed, a virtuous man full of Ayurveda appeared from that Ksheera Sagar, who had a staff in one hand and a water pot in the other. His name was Dhanvantari. After his appearance, many beautiful nymphs appeared from the ocean.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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