श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 45: देवताओं और दैत्यों द्वारा क्षीर-समुद्र मन्थन, भगवान् रुद्र द्वारा हालाहल विष का पान, देवासुर-संग्राम में दैत्यों का संहार  »  श्लोक 23-24
 
 
श्लोक  1.45.23-24 
उवाचैनं स्मितं कृत्वा रुद्रं शूलधरं हरि:।
दैवतैर्मथ्यमाने तु यत्पूर्वं समुपस्थितम्॥ २३॥
तत् त्वदीयं सुरश्रेष्ठ सुराणामग्रतो हि यत्।
अग्रपूजामिह स्थित्वा गृहाणेदं विषं प्रभो॥ २४॥
 
 
अनुवाद
श्रीहरि ने हँसकर त्रिशूलधारी भगवान रुद्र से कहा - 'हे देवश्रेष्ठ! देवताओं ने समुद्र मंथन करके जो प्रथम वस्तु प्राप्त की, वही आपका भाग है; क्योंकि आप समस्त देवताओं में श्रेष्ठ हैं। हे प्रभु! आप यहाँ खड़े होकर इस विष को, जो आपको प्रथम आहुति के रूप में प्राप्त हुआ है, ग्रहण कीजिए।'॥ 23-24॥
 
Sri Hari smiled and said to Lord Rudra holding the trident - 'O best of the gods! The first thing that was obtained when the gods churned the ocean is your share; because you are the foremost among all the gods. Lord! Stand here and accept this poison that you have received as the first offering.'॥ 23-24॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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