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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 45: देवताओं और दैत्यों द्वारा क्षीर-समुद्र मन्थन, भगवान् रुद्र द्वारा हालाहल विष का पान, देवासुर-संग्राम में दैत्यों का संहार  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  1.45.17 
तेषां चिन्तयतां तत्र बुद्धिरासीद् विपश्चिताम्।
क्षीरोदमथनं कृत्वा रसं प्राप्स्याम तत्र वै॥ १७॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार विचार करते हुए विचारशील देवताओं और दानवों के मन में यह विचार आया कि यदि हम क्षीरसागर का मंथन करें तो उसमें से हमें अवश्य ही अमृततुल्य रस प्राप्त होगा॥17॥
 
'While contemplating in this manner, the thoughtful gods and demons came to their mind that if they churn the ocean of milk, they will certainly obtain the nectar-like juice from it.॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)