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ramayan 1.45.16: 'पुरुषसिंह! उन महामनस्वी दैत्यों और देवताओं के मन में यह विचार आया कि हम लोग अमर और रोगरहित कैसे हो सकते हैं?॥16॥   |   ramayan सर्ग 1.45: देवताओं और दैत्यों द्वारा क्षीर-समुद्र मन्थन, भगवान् रुद्र द्वारा हालाहल विष का पान, देवासुर-संग्राम में दैत्यों का संहार   ।   ramayan काण्ड 1: बाल काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 45: देवताओं और दैत्यों द्वारा क्षीर-समुद्र मन्थन, भगवान् रुद्र द्वारा हालाहल विष का पान, देवासुर-संग्राम में दैत्यों का संहार  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  1.45.16 
ततस्तेषां नरव्याघ्र बुद्धिरासीन्महात्मनाम्।
अमरा विजराश्चैव कथं स्यामो निरामया:॥ १६॥
 
 
अनुवाद
'पुरुषसिंह! उन महामनस्वी दैत्यों और देवताओं के मन में यह विचार आया कि हम लोग अमर और रोगरहित कैसे हो सकते हैं?॥16॥
 
'Purushasingh! This thought came into the minds of those great-minded demons and gods: how can we become immortal and disease-free?॥ 16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)