श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 44: ब्रह्माजी का भगीरथ को पितरों के तर्पण की आज्ञा देना, गंगावतरण के उपाख्यान की महिमा  »  श्लोक 9-10
 
 
श्लोक  1.44.9-10 
तथैवांशुमता वत्स लोकेऽप्रतिमतेजसा।
गंगां प्रार्थयता नेतुं प्रतिज्ञा नापवर्जिता॥ ९॥
राजर्षिणा गुणवता महर्षिसमतेजसा।
मत्तुल्यतपसा चैव क्षत्रधर्मस्थितेन च॥ १०॥
 
 
अनुवाद
‘बेटा! इसी प्रकार संसार में अद्वितीय प्रभाव वाले, उत्तम गुणों वाले, महर्षि के समान तेजस्वी, मेरे समान तपस्वी और क्षत्रिय धर्म में तत्पर राजा अंशुमान ने भी गंगाजी को यहाँ लाने की इच्छा की थी; परन्तु वे उन्हें इस पृथ्वी पर लाने का अपना वचन पूरा न कर सके॥9-10॥
 
‘Son! Similarly, King Anshuman, who is unmatched in influence in the world, has excellent qualities, is as radiant as a great sage, is an ascetic like me and is devoted to the Kshatriya Dharma, also desired to bring Ganga here; but he could not fulfil his promise of bringing her to this earth.॥ 9-10॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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