श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 44: ब्रह्माजी का भगीरथ को पितरों के तर्पण की आज्ञा देना, गंगावतरण के उपाख्यान की महिमा  »  श्लोक 21-22
 
 
श्लोक  1.44.21-22 
धन्यं यशस्यमायुष्यं पुत्र्यं स्वर्ग्यमथापि च।
य: श्रावयति विप्रेषु क्षत्रियेष्वितरेषु च॥ २१॥
प्रीयन्ते पितरस्तस्य प्रीयन्ते दैवतानि च।
इदमाख्यानमायुष्यं गंगावतरणं शुभम्॥ २२॥
 
 
अनुवाद
गंगा अवतरण की यह मंगलमय कथा आयु बढ़ाती है। यह धन, यश, आयु, पुत्र और स्वर्ग प्रदान करती है। जो व्यक्ति ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा अन्य वर्णों के लोगों को यह कथा सुनाता है, उस पर देवता और पितर प्रसन्न होते हैं।
 
This auspicious story of the descent of the Ganges increases one's lifespan. It gives wealth, fame, longevity, sons and heaven. The gods and ancestors are pleased with the one who narrates this story to Brahmins, Kshatriyas and people of other castes. 21-22.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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