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ramayan 1.44.17-18: हे पुरुषश्रेष्ठ! महामुनि राजा भगीरथ भी सगर के समस्त पुत्रों का गंगाजी के उत्तम जल से विधिपूर्वक तर्पण करके पवित्र हो गए और अपने नगर को चले गए। इस प्रकार अपना मनोरथ सिद्ध करके वे अपना राज्य चलाने लगे। 17-18॥   |   ramayan सर्ग 1.44: ब्रह्माजी का भगीरथ को पितरों के तर्पण की आज्ञा देना, गंगावतरण के उपाख्यान की महिमा   ।   ramayan काण्ड 1: बाल काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 44: ब्रह्माजी का भगीरथ को पितरों के तर्पण की आज्ञा देना, गंगावतरण के उपाख्यान की महिमा  »  श्लोक 17-18
 
 
श्लोक  1.44.17-18 
भगीरथस्तु राजर्षि: कृत्वा सलिलमुत्तमम्।
यथाक्रमं यथान्यायं सागराणां महायशा:॥ १७॥
कृतोदक: शुची राजा स्वपुरं प्रविवेश ह।
समृद्धार्थो नरश्रेष्ठ स्वराज्यं प्रशशास ह॥ १८॥
 
 
अनुवाद
हे पुरुषश्रेष्ठ! महामुनि राजा भगीरथ भी सगर के समस्त पुत्रों का गंगाजी के उत्तम जल से विधिपूर्वक तर्पण करके पवित्र हो गए और अपने नगर को चले गए। इस प्रकार अपना मनोरथ सिद्ध करके वे अपना राज्य चलाने लगे। 17-18॥
 
Male best! The great sage King Bhagiratha also got purified after ritually offering all the sons of Sagar with the good water of Ganga and went to his city. In this way, having achieved his wish, he started ruling his kingdom. 17-18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)