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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 44: ब्रह्माजी का भगीरथ को पितरों के तर्पण की आज्ञा देना, गंगावतरण के उपाख्यान की महिमा  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  1.44.15 
पितामहानां सर्वेषां कुरुष्व सलिलक्रियाम्।
स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि स्वं लोकं गम्यतां नृप॥ १५॥
 
 
अनुवाद
‘नरेश्वर! आप अपने समस्त पितरों का तर्पण करें। आपका कल्याण हो। अब मैं अपने लोक को जाऊँगा। आप भी अपनी राजधानी को लौट जाएँ।’॥15॥
 
‘Nareshwar! You should offer prayers to all your ancestors. May you be blessed. Now I will go to my world. You also should return to your capital.’॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)