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ramayan 1.43.20-21h: वह निर्मल, मेघरहित आकाश तीव्र गति से चलने वाले देवताओं और उनके दिव्य आभूषणों के प्रकाश से ऐसा प्रकाशित हो रहा था, मानो उसमें सैकड़ों सूर्य उदय हो गए हों ॥20 1/2॥   |   ramayan सर्ग 1.43: भगीरथ की तपस्या, भगवान् शङ्कर का गंगा को अपने सिर पर धारण करना, भगीरथ के पितरों का उद्धार   ।   ramayan काण्ड 1: बाल काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 43: भगीरथ की तपस्या, भगवान् शङ्कर का गंगा को अपने सिर पर धारण करना, भगीरथ के पितरों का उद्धार  »  श्लोक 20-21h
 
 
श्लोक  1.43.20-21h 
सम्पतद्भि: सुरगणैस्तेषां चाभरणौजसा॥ २०॥
शतादित्यमिवाभाति गगनं गततोयदम्।
 
 
अनुवाद
वह निर्मल, मेघरहित आकाश तीव्र गति से चलने वाले देवताओं और उनके दिव्य आभूषणों के प्रकाश से ऐसा प्रकाशित हो रहा था, मानो उसमें सैकड़ों सूर्य उदय हो गए हों ॥20 1/2॥
 
The clear, cloudless sky was illuminated by the light of the fast-moving gods and their celestial ornaments, as if hundreds of suns had risen in it. ॥20 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)