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श्लोक 1.41.4  |
अभिवाद्याभिवाद्यांस्त्वं हत्वा विघ्नकरानपि।
सिद्धार्थ: संनिवर्तस्व मम यज्ञस्य पारग:॥ ४॥ |
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| अनुवाद |
| 'जो आदर के योग्य हैं, उन्हें नमस्कार करो और जो तुम्हारे मार्ग में विघ्न डालते हैं, उनका वध करो। ऐसा करके अपनी कामनाओं को पूर्ण करके लौट आओ और मेरे इस यज्ञ को पूर्ण करो।'॥4॥ |
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| 'Salute those who are worthy of respect and kill those who create obstacles in your path. Doing so, return with your wishes fulfilled and complete this yagya of mine.'॥ 4॥ |
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