श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 4: महर्षि वाल्मीकि का चौबीस हजार श्लोकों से युक्त रामायण का निर्माण करना , लव-कुश का अयोध्या में रामायण गान सुनाना  »  श्लोक 26-27h
 
 
श्लोक  1.4.26-27h 
आश्चर्यमिदमाख्यानं मुनिना सम्प्रकीर्तितम्॥ २६॥
परं कवीनामाधारं समाप्तं च यथाक्रमम्।
 
 
अनुवाद
महर्षि वाल्मीकि द्वारा वर्णित यह अद्भुत काव्य परवर्ती कवियों के लिए सर्वोत्तम आधारशिला है। इसमें श्री रामचन्द्रजी के सम्पूर्ण चरित्र का क्रमवार वर्णन करके समापन किया गया है।
 
This wonderful poem narrated by Maharishi Valmiki is the best foundation stone for the later poets. It has been concluded by describing the entire character of Shri Ramchandraji in sequence. 26 1/2.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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