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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 4: महर्षि वाल्मीकि का चौबीस हजार श्लोकों से युक्त रामायण का निर्माण करना , लव-कुश का अयोध्या में रामायण गान सुनाना  »  श्लोक 19-20h
 
 
श्लोक  1.4.19-20h 
एवं प्रशस्यमानौ तौ तप: श्लाघ्यैर्महर्षिभि:॥ १९॥
संरक्ततरमत्यर्थं मधुरं तावगायताम्।
 
 
अनुवाद
इस प्रकार महान तपस्वी ऋषियों ने उन दोनों राजकुमारों की स्तुति की और उनसे स्तुति पाकर उन्होंने अत्यन्त मधुर स्वर में रामायण का गायन किया।
 
In this manner, the great sages, endowed with great austerities, praised those two princes, and being praised by them, they sang the Ramayana in a very sweet melody.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)