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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 33: राजा कुशनाभ द्वारा कन्याओं के धैर्य एवं क्षमाशीलता की प्रशंसा, ब्रह्मदत्त की उत्पत्ति,कुशनाभ की कन्याओं का विवाह  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  1.33.4 
तेन पापानुबन्धेन वचनं न प्रतीच्छता।
एवं ब्रुवन्त्य: सर्वा: स्म वायुनाभिहता भृशम्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
लेकिन उसका मन पाप से बंधा हुआ था। उसने हमारी एक न सुनी। हम सभी बहनें एक जैसी ही धार्मिक बातें कह रही थीं, फिर भी उसने हमें बहुत दुःख पहुँचाया - बिना किसी दोष के उसने हमें सताया।
 
But his mind was bound by sin. He did not listen to us. All of us sisters were saying the same righteous things, yet he hurt us deeply – he tormented us without any fault.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)