श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 33: राजा कुशनाभ द्वारा कन्याओं के धैर्य एवं क्षमाशीलता की प्रशंसा, ब्रह्मदत्त की उत्पत्ति,कुशनाभ की कन्याओं का विवाह  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  1.33.25 
कृतोद्वाहं तु राजानं ब्रह्मदत्तं महीपतिम्।
सदारं प्रेषयामास सोपाध्यायगणं तदा॥ २५॥
 
 
अनुवाद
भूपाल राजा ब्रह्मदत्त का विवाह सम्पन्न होने पर महाराज कुशनाभ ने उन्हें उनकी पत्नियों और पुरोहितों सहित आदरपूर्वक विदा किया।
 
After the marriage of Bhupal King Brahmadatta was completed, Maharaja Kushanabha respectfully bid him farewell along with his wives and priests. 25.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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