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ramayan 1.30.11-12: जैसे वर्षा ऋतु में बादल सम्पूर्ण आकाश को ढक लेते हैं, उसी प्रकार मारीच और सुबाहु नामक राक्षस अपना जादू सर्वत्र फैलाते हुए यज्ञ मण्डप की ओर दौड़े चले आ रहे थे। उनके अनुयायी भी उनके साथ थे। वे भयंकर राक्षस वहाँ आकर रक्त की धाराएँ बहाने लगे ॥11-12॥   |   ramayan सर्ग 1.30: श्रीराम द्वारा विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा तथा राक्षसों का संहार   ।   ramayan काण्ड 1: बाल काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 30: श्रीराम द्वारा विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा तथा राक्षसों का संहार  »  श्लोक 11-12
 
 
श्लोक  1.30.11-12 
आवार्य गगनं मेघो यथा प्रावृषि दृश्यते।
तथा मायां विकुर्वाणौ राक्षसावभ्यधावताम्॥ ११॥
मारीचश्च सुबाहुश्च तयोरनुचरास्तथा।
आगम्य भीमसंकाशा रुधिरौघानवासृजन्॥ १२॥
 
 
अनुवाद
जैसे वर्षा ऋतु में बादल सम्पूर्ण आकाश को ढक लेते हैं, उसी प्रकार मारीच और सुबाहु नामक राक्षस अपना जादू सर्वत्र फैलाते हुए यज्ञ मण्डप की ओर दौड़े चले आ रहे थे। उनके अनुयायी भी उनके साथ थे। वे भयंकर राक्षस वहाँ आकर रक्त की धाराएँ बहाने लगे ॥11-12॥
 
Just as during the rainy season, the clouds appear to cover the entire sky, similarly the demons named Marich and Subahu were spreading their magic everywhere and were running towards the yajna mandap. Their followers were also with them. Those fierce demons came there and started pouring streams of blood. ॥ 11-12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)