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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 23: विश्वामित्र सहित श्रीराम और लक्ष्मण का सरयू-गंगा संगम के समीप पुण्य आश्रम में रात को ठहरना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  1.23.10 
कन्दर्पो मूर्तिमानासीत् काम इत्युच्यते बुधै:।
तपस्यन्तमिह स्थाणुं नियमेन समाहितम्॥ १०॥
 
 
अनुवाद
'जिसे विद्वान पुरुष काम कहते हैं, वह कन्दर्प पूर्वकाल में मूर्तिरूप में था - वह शरीर धारण करके विचरण करता था। उन दिनों भगवान स्थाणु (शिव) इसी आश्रम में मन को एकाग्र करके नियमित रूप से तप करते थे। 10॥
 
'What the learned man calls Kama, that Kandarpa was in the form of an idol in earlier times - he used to roam around in a body. In those days, Lord Sthanu (Shiva) used to concentrate his mind and perform penance regularly in this ashram. 10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)