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ramayan 1.20.28: राजा दशरथ के ऐसे वचन सुनकर भयंकर कुशिकानन्दन विश्वामित्र के मन में महान क्रोध भर गया, जैसे यज्ञ की अग्नि में घी की धारा से भलीभाँति अभिषेक करने पर वह जलने लगती है, उसी प्रकार अग्नि के समान तेजस्वी महर्षि विश्वामित्र भी क्रोध से दग्ध हो जाते हैं॥28॥   |   ramayan सर्ग 1.20: राजा दशरथ का विश्वामित्र को अपना पुत्र देने से इनकार करना और विश्वामित्र का कुपित होना   ।   ramayan काण्ड 1: बाल काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 20: राजा दशरथ का विश्वामित्र को अपना पुत्र देने से इनकार करना और विश्वामित्र का कुपित होना  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  1.20.28 
इति नरपतिजल्पनाद् द्विजेन्द्रं
कुशिकसुतं सुमहान् विवेश मन्यु:।
सुहुत इव मखेऽग्निराज्यसिक्त:
समभवदुज्ज्वलितो महर्षिवह्नि:॥ २८॥
 
 
अनुवाद
राजा दशरथ के ऐसे वचन सुनकर भयंकर कुशिकानन्दन विश्वामित्र के मन में महान क्रोध भर गया, जैसे यज्ञ की अग्नि में घी की धारा से भलीभाँति अभिषेक करने पर वह जलने लगती है, उसी प्रकार अग्नि के समान तेजस्वी महर्षि विश्वामित्र भी क्रोध से दग्ध हो जाते हैं॥28॥
 
Hearing such words of King Dasharatha, the fierce Kushikanandan Vishwamitra got filled with great anger in his mind, just like if the fire in the sacrificial fire is properly anointed with a stream of ghee and it starts burning, in the same way Maharishi Vishwamitra, who is as bright as fire, also gets burnt with anger. 28॥
 
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे विंश: सर्ग:॥ २०॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें बीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २०॥
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)