श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 2: तमसा तट पर क्रौंचवध की घटना से शोक संतप्त वाल्मीकि को ब्रह्मा द्वारा रामचरित्रमय काव्य लेखन का आदेश देना  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  1.2.8 
स शिष्यहस्तादादाय वल्कलं नियतेन्द्रिय:।
विचचार ह पश्यंस्तत् सर्वतो विपुलं वनम्॥ ८॥
 
 
अनुवाद
शिष्य के हाथ से छाल लेकर, इन्द्रियों को वश में करके मुनि विशाल वन की शोभा देखते हुए, सब दिशाओं में विचरण करने लगे ॥8॥
 
Taking the bark from the disciple's hand, the sage having controlled the senses started wandering in all directions, beholding the beauty of the huge forest. ॥ 8॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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