श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 2: तमसा तट पर क्रौंचवध की घटना से शोक संतप्त वाल्मीकि को ब्रह्मा द्वारा रामचरित्रमय काव्य लेखन का आदेश देना  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  1.2.40 
समाक्षरैश्चतुर्भिर्य: पादैर्गीतो महर्षिणा।
सोऽनुव्याहरणाद् भूय: शोक: श्लोकत्वमागत:॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
'हमारे गुरुदेव महर्षि ने सारस के दुःख से दुःखी होकर जो समान अक्षरों वाली चार पंक्तियों वाला वाक्य गाया था, वह वास्तव में उनके हृदय का दुःख था; किन्तु जब वह उनकी वाणी से उच्चारित हुआ, तो उसने श्लोक का रूप धारण कर लिया।'॥40॥
 
'The sentence consisting of four lines with similar syllables which our Gurudev Maharshi sang when he was saddened by the suffering of the crane was actually the grief of his heart; but when uttered by his voice it took the form of a verse.'॥ 40॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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