श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 2: तमसा तट पर क्रौंचवध की घटना से शोक संतप्त वाल्मीकि को ब्रह्मा द्वारा रामचरित्रमय काव्य लेखन का आदेश देना  »  श्लोक 30-31
 
 
श्लोक  1.2.30-31 
तमुवाच ततो ब्रह्मा प्रहसन् मुनिपुंगवम्॥ ३०॥
श्लोक एवास्त्वयं बद्धो नात्र कार्या विचारणा।
मच्छन्दादेव ते ब्रह्मन् प्रवृत्तेयं सरस्वती॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
ब्रह्माजी उनकी मनःस्थिति समझकर हँसने लगे और ऋषि वाल्मीकि से इस प्रकार बोले- 'ब्रह्मन्! आपके मुख से निकला यह वाक्य अवश्य ही श्लोक रूप में होगा। इस विषय में आपको अन्यथा नहीं सोचना चाहिए। मेरे ही संकल्प या प्रेरणा से आपके मुख से ऐसे वचन निकले हैं।'
 
Brahmaji started laughing after understanding his state of mind and said to sage Valmiki in this manner- 'Brahman! This sentence in rhyme that came out of your mouth must be in the form of a verse. You should not think otherwise in this matter. Such words have come out of your mouth only due to my resolve or inspiration.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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