श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 2: तमसा तट पर क्रौंचवध की घटना से शोक संतप्त वाल्मीकि को ब्रह्मा द्वारा रामचरित्रमय काव्य लेखन का आदेश देना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  1.2.18 
पादबद्धोऽक्षरसमस्तन्त्रीलयसमन्वित:।
शोकार्तस्य प्रवृत्तो मे श्लोको भवतु नान्यथा॥ १८॥
 
 
अनुवाद
'पिताजी! मेरे मुख से जो वाक्य दुःखपूर्वक निकला है, वह चार पंक्तियों में बँधा है। उसकी प्रत्येक पंक्ति में बराबर (अर्थात् आठ) अक्षर हैं और वह वीणा के स्वर में गाया भी जा सकता है; अतः मेरा यह कथन पद्यरूप में (अर्थात् छंद नामक मात्रा में बँधे हुए काव्य या यश के रूप में) होना चाहिए, अन्यथा नहीं।'
 
‘Father! The sentence which has come out of my mouth in grief is bound in four lines. Each of its lines has equal (i.e. eight) syllables and it can also be sung to the tune of the Veena; hence this statement of mine should be in the form of a verse (i.e. in the form of poetry or fame bound in a meter called a verse), not otherwise’.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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