श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 18: श्रीराम, भरत, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न के जन्म, संस्कार, शीलस्वभाव एवं सद्गुण, राजा के दरबार में विश्वामित्र का आगमन और उनका सत्कार  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  1.18.57 
इच्छाम्यनुगृहीतोऽहं त्वदर्थं परिवृद्धये।
कार्यस्य न विमर्शं च गन्तुमर्हसि सुव्रत॥ ५७॥
 
 
अनुवाद
हे उत्तम व्रतों का पालन करने वाले महर्षि! मैं आपकी कृपा से धन्य होना चाहता हूँ, आपकी अभीष्ट इच्छा को जानना चाहता हूँ तथा अपने कल्याण के लिए उसे पूर्ण करना चाहता हूँ। आप अपने मन में 'कार्य सिद्ध होगा या नहीं' जैसी शंका न आने दें। 57.
 
'O Maharishi who observes the best vows! I want to be blessed by your grace and know your desired desire and fulfill it for my own prosperity. Do not allow doubts like 'whether the task will be accomplished or not' to enter your mind. 57.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)