श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 18: श्रीराम, भरत, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न के जन्म, संस्कार, शीलस्वभाव एवं सद्गुण, राजा के दरबार में विश्वामित्र का आगमन और उनका सत्कार  »  श्लोक 36-37h
 
 
श्लोक  1.18.36-37h 
ते चापि मनुजव्याघ्रा वैदिकाध्ययने रता:॥ ३६॥
पितृशुश्रूषणरता धनुर्वेदे च निष्ठिता:।
 
 
अनुवाद
वह पुरुषसिंह राजकुमार प्रतिदिन वेदों के स्वाध्याय, पिता की सेवा और धनुर्वेद के अभ्यास में तत्पर रहता था ॥36 1/2॥
 
That Purushasingh Prince remained dedicated every day to self-study of the Vedas, service to his father and practice of Dhanurveda. 36 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)