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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 15: ऋष्यशृंग द्वारा राजा दशरथ के पुत्रेष्टि यज्ञ का आरम्भ, ब्रह्माजी का रावण के वध का उपाय ढूँढ़ निकालना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  1.15.3 
तत: प्राक्रमदिष्टिं तां पुत्रीयां पुत्रकारणात्।
जुहावाग्नौ च तेजस्वी मन्त्रदृष्टेन कर्मणा॥ ३॥
 
 
अनुवाद
ऐसा कहकर उन तेजस्वी ऋषि ने पुत्र प्राप्ति के उद्देश्य से पुत्रेष्टि नामक यज्ञ प्रारम्भ किया और श्रौत परम्परा के अनुसार अग्नि में आहुतियाँ दीं॥3॥
 
Saying this, that brilliant sage started a yagya called Putreshti with the aim of having a son and offered oblations in the fire as per the Shrauta tradition. 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)