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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 14: महाराज दशरथ के द्वारा अश्वमेध यज्ञ का सांगोपांग अनुष्ठान  »  श्लोक 60
 
 
श्लोक  1.14.60 
स तस्य वाक्यं मधुरं निशम्य
प्रणम्य तस्मै प्रयतो नृपेन्द्र:।
जगाम हर्षं परमं महात्मा
तमृष्यशृंगं पुनरप्युवाच॥ ६०॥
 
 
अनुवाद
उनके ये मधुर वचन सुनकर मन और इन्द्रियों को वश में रखने वाले महापुरुष महाराज दशरथ उन्हें प्रणाम करके बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने ऋष्यश्रृंग को पुनः पुत्र प्राप्ति का अनुष्ठान करने की प्रेरणा दी ॥60॥
 
Hearing these sweet words of his, Maharaj Dashrath, the great man who kept his mind and senses under control, felt very happy after paying respects to him and he inspired Rishyashringa to perform the ritual of getting a son again. 60॥
 
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे चतुर्दश: सर्ग:॥ १४॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें चौदहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १४॥
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)