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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 14: महाराज दशरथ के द्वारा अश्वमेध यज्ञ का सांगोपांग अनुष्ठान  »  श्लोक 57-58h
 
 
श्लोक  1.14.57-58h 
तत: प्रीतमना राजा प्राप्य यज्ञमनुत्तमम्॥ ५७॥
पापापहं स्वर्नयनं दुस्तरं पार्थिवर्षभै:।
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात, उस महान यज्ञ का पुण्य फल पाकर राजा दशरथ अत्यंत प्रसन्न हुए। वह यज्ञ उनके समस्त पापों का नाश करके उन्हें स्वर्ग ले जाने वाला था। सामान्य राजाओं के लिए उस यज्ञ को आरंभ से अंत तक पूर्ण करना अत्यंत कठिन था।
 
Thereafter, King Dasharath was very happy after getting the virtuous result of that great yajna. That yajna was going to destroy all his sins and take him to heaven. It was very difficult for ordinary kings to complete that yajna from beginning to end.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)